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बदलाव की यात्रा पर आदित्य

तुलसीदास का लिखा दोहा ‘जाके पाँव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई’, हमने सुना तो कई बार है लेकिन, उसे महसूस हम तब ही कर पाते हैं जब हमारे साथ कुछ दुखद होता है। दुख के वक्त में व्यक्ति क्या करता है? उस दुख को कम करने के उपाय खोजता, उस दुख से उबरने की कोशिश करता है। लेकिन, ऐसे कितने लोग होते हैं जो उस हालात से निपटने के बाद इस बात का प्रण ले लेते हैं कि अब ये दुख औरों को नहीं होने चाहिए। इंडिया स्टोरी प्रोजेक्ट लगातार आप तक ऐसे ही लोगों की कहानियां ला रहा है और इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए हम आपको आज मिलवाते हैं आदित्य चरेगांवकर ‘य़ात्री’ से। एक अनाथ आश्रम में अपना जीवन बिताने वाले आदित्य आज काम कर रहे हैं अपने ही जैसे युवाओं के लिए। आइये जानते हैं उनकी कहानी।

युवाओं में आत्मविश्वास जगाते आदित्य

साल 2020 में जब कोरोना वायरस ने दुनिया को अपने आगोश में समेटा तब लोगों ने कई नयी चीजों को महसूस किया, नयी परेशानियों से लोग दो-चार हुए। खासकर लॉकडाउन का मुश्किल वक्त कइयों के लिए हजारों परेशानियां लेकर आया। आदित्य चरेगांवकर ने इस दौरान महसूस किया कि 18 साल की उम्र पूरी करते ही अनाथ आश्रमों से निकल जाने वाले युवाओं के लिए ये वक्त बेहद मुश्किल साबित हो रहा है। 18 साल का होना, वयस्क होना तो है लेकिन, हर कोई इस उम्र तक आत्मनिर्भर हो जाये ये संभव नहीं। दरअसल हमारे देश में अनाथ या फिर गुमशुदा बच्चों के लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर अनाथ आश्रम और अन्य ऐसी सुविधाएं तो हैं लेकिन साथ ही में ये नियम भी है कि 18 साल के होते ही इन बच्चों को ये आश्रय छोड़ना होता है। कई युवा कुछ न कुछ काम करने लग जाते हैं। लेकिन, पहले और दूसरे लॉकडाउन के दौरान आदित्य ने महसूस किया कि कई ऐसे युवा हैं जिन्होंने अपनी नौकरी खो दी, जो अपने कमरों का किराया तक नहीं दे पाये। पहले लॉकडाउन के वक्त आदित्य ने अपने ऐसे साथियों की सुध ली और अपने कुछ दोस्तों के साथ एक सर्वे किया और पाया कि 442 ऐसे युवा हैं जो मुश्किल में हैं। उन्होंने इनके लिए फंड रेज़ किया। लेकिन, दूसरे लॉकडाउन में फिर यही सारी मुश्किलें खड़ी हो गयी। आदित्य आज के वक्त में ऐसे ही युवाओं के लिए काम कर रहे हैं। वो यूथ केयर लीवर्स एसोसिएशन इंडिया नाम की संस्था से जुड़े हुए हैं।

अनाथ से बने कइयों के नाथ

आदित्य महज 3 साल के थे जब वो अपने माता-पिता से अलग हो गये थे। मुंबई पुलिस को जब वो मिले तो उन्हें कुछ याद नहीं था। साल 1993 का वो वक्त जब मुंबई बम ब्लास्ट से दहल गयी थी, आदित्य जैसे कई बच्चे अपने मां-बाप से अलग हुए होंगे। पुलिस ने उन्हें अनाथालय भेज दिया। इसके बाद वो अलग-अलग शहरों में और अलग-अलग अनाथ आश्रमों में रहे। ऐसे ही एक आश्रम में उन्हें ये नाम मिला। उन्होंने अनाथालय की ज़िंदगी में ख़ुद को ढाल लिया। आदित्य ने शुरुआत से ही अपनी पढ़ाई को सामाजिक मुद्दों पर केन्द्रित रखा। इस दौरान उन्होंने ये महसूस किया कि नियम तो बहुत हैं लेकिन, उन्हें लागू करने में कई रुकावटें हैं। खासकर जब ये बच्चे, युवा हो जाते हैं। लड़कियों के साथ तो कई बार शारीरिक शोषण तक हो जाता है। यही बातें उनके दिल-ओ-दिमाग पर असर करने लगीं और उन्होंने इसे ही अपना कर्मक्षेत्र बनाने का फ़ैसला कर लिया।

उन्होंने कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के साथ काम किया। आज वो डॉक्टरेट की पढ़ाई कर रहे हैं और उनके शोध का विषय यहीं युवा हैं जो अनाथ आश्रमों से निकलकर बेहतर भविष्य के लिए जूझते हैं।

आश्रम के बाद आफ़्टरकेयर की ज़रूरत

आदित्य चरेगांवकर ‘य़ात्री’ सरकार की ओर से संचालित आफ्टरकेयर प्रोग्राम के साथ जुड़े हुए हैं। वो युवाओं को सरकार की ओर से दी जाने वाली सुविधाओं से सीधे जोड़ने के लिए काम करते हैं। इसके अलावा भी वो कई ऐसी संस्थाओं के साथ काम कर रहे हैं जो इन युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए काम करती हैं। कोरोनाकाल के दौरान उन्होंने यूथ केयर लीवर्स नाम की संस्था का यूनिसेफ के साथ गठन किया। इस संस्था ने उस वक्त आठ सौ से अधिक युवाओं की मदद की।

नए जीवन का ‘आदित्य स्तोत्र’

आदित्य उन युवाओं के लिए उम्मीद की नई किरण हैं जो बचपन में अपने परिवार से बिछड़े और फिर युवावस्था में क़दम रखते ही उस आश्रम से जहां वो लंबे समय तक रहे। आदित्य ऐसे युवाओं को जीने की राह दिखा रहे हैं। उनके आत्मबल को मजबूत कर रहे हैं। कई तरह के प्रोग्राम और एक्टिविटी के ज़रिए उन्हें प्रोत्साहित कर रहे हैं, उनमें टीम भावना विकसित कर रहे हैं ताकि आगे चल कर वो अपनी ज़िंदगी के संघर्ष को जीत सकें। आदित्य एक मिसाल हैं। आदित्य ने अपने जीवन की परेशानियों को न सिर्फ़ सकारात्मक तौर पर लिया बल्कि उन्होंने अपने जैसे कई लोगों के लिए रास्ता तलाशने का भी काम किया। आदित्य ‘यात्री’ की इस यात्रा को इंडिया स्टोरी प्रोजेक्ट का सलाम।