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नीमच में कृषि क्रांति

एक किसान का शिक्षित होना कितना ज़रूरी है, किसान को नई तकनीकों, खेती की नई विधियों की जानकारी होना कितना ज़रूरी है इन सवालों के जवाब हैं नीमच के कमलाशंकर विश्वकर्मा। कमलाशंकर सिर्फ़ एक किसान नहीं हैं। वो एक मिसाल हैं, ना केवल नीमच के बल्कि पूरे देश के किसानों के लिए। आज इंडिया स्टोरी प्रोजेक्ट में कहानी किसान कमलाशंकर की।

पत्रकारिता से किसान तक का सफ़र

माइक्रोबायोलॉजी और सोशल स्टडीज़ की पढ़ाई करने वाले कमलाशंकर विश्वकर्मा शुरुआत से ही सामाजिक कार्यों से जुड़े रहे। यही जुड़ाव उन्हें पत्रकारिता तक भी ले गया। कई प्रतिष्ठित अख़बारों में काम करने के बाद अब कमलाशंकर विश्वकर्मा खेती में क्रांतिकारी बदलाव लाने में जुटे हुए हैं। नीमच में मनासा तहसील के भाटखेड़ी गांव में रहने वाले कमलाशंकर के खेत इस बदलाव की प्रयोगशाला बन चुके हैं।

औषधीय पौधों की खेती

कमलाशंकर ने खेती में बदलाव की शुरुआत परंपरागत फसलों को बदल कर की। उन्होंने सामान्य रूप से उगाई जाने वाली फसलों से अलग हट कर खेती करने का फ़ैसला किया। उनकी ये सोच जाकर टिकी औषधीय फसलों की खेती पर। उन्होंने अपने खेत में कौंच बीज, नीली अपराजिता, कंटकारी, शिवलिंगी, छोटी-बड़ी दूधी, शतावरी, मूषपर्णी, अश्वगंधा, अरंडी, नीम, गिलोय जैसे कई औषधीय पौधे लगाए हैं। आयुर्वेद से लगाव रखने वाले कमलाशंकर जानते हैं कि इन औषधीय फसलों के क्या-क्या इस्तेमाल हो सकते हैं। तैयार फसलों के लिए आयुर्वेदिक दवा बनाने वाली कंपनियों का अच्छा ख़ासा बाज़ार भी उपलब्ध है। इसके लिए कमलाशंकर को भटकने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

बांस के साथ दूसरी फसलों की खेती

कमलाशंकर खेती से जुड़ी सरकारी योजनाओं की पूरी जानकारी रखते हैं। इसी क्रम में उन्हें राष्ट्रीय बांस मिशन का पता चला। वन विभाग से प्रति बांस के पौधे पर 120 रुपये का अनुदान लेकर कमलाशंकर ने अपने खेत में बड़े पैमाने पर बांस के पौधे रोपे। इन्हें खेत के चारों तरफ़ लगाया जिससे बड़े होने पर ये खेती की घेराबंदी में भी इस्तेमाल हो जाएं।

अंतरवर्ती फसल से बदली खेती

कमलाशंकर ने एक बार में एक फसल लगाने के बजाय अंतरवर्ती फसल लगाने की शुरुआत की। उन्होंने बांस के पौधों के बीच शतावरी और अश्वगंधा की फसल लगाई। जब तक बांस की फसल तैयार होगी तब तक ज़मीन के अंदर कंद के रूप में होने वाली ये दोनों फसलें मुनाफ़ा देती रहेंगी। अक्सर किसान बांस लगाने के बाद बीच की ख़ाली ज़मीन को छोड़ देते हैं। बांस तैयार होने में कई साल लगते हैं। ऐसे में खेत से आय पूरी तरह रूक जाती है लेकिन अंतरवर्ती फसल के ज़रिये दूसरी फसलों से आय की जा सकती है।

इसी तरह कमलाशंकर ने उद्यान विभाग और मनरेगा योजना के तहत संतरे के पौधों के बीच शतावरी और अश्वगंधा की फसल लगाई। ख़ास बात ये है कि कमलाशंकर खेती के ज़्यादातर लागत सरकारी योजनाओं से मिलने वाले अनुदान से ही पूरा कर लेते हैं।

प्राकृतिक खाद और कीटनाशक

कमलाशंकर माइक्रोबायोलॉजी के छात्र रहे हैं। इस पढ़ाई का फ़ायदा वो कृषि में भी उठाते हैं। अपने खेत में रासायनिक के बजाय गाय के गोबर से तैयार खाद का इस्तेमाल वो करते हैं। इसके साथ ही जैविक कीटनाशक ख़ुद तैयार करते हैं। इससे खेती के साथ-साथ प्रकृति का संरक्षण भी हो रहा है।

मिसाल बन चुके हैं कमलाशंकर

कमलाशंकर को प्रशासन और राज्य सरकार की तरफ़ से कई बार सम्मानित भी किया गया है। खेती को लेकर उनके नवाचार दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। अक्सर आसपास के किसान उनके पास आते हैं। उनसे खेती की नई तकनीकों की जानकारी हासिल करते हैं। अंतरवर्ती खेती के गुर सीखते हैं, यहां तक कि किसानों के लिए चल रही सरकारी योजनाओं के बारे में भी पूछते हैं। कमलाशंकर सहर्ष इन किसानों को उनकी मांगी सभी जानकारियां मुहैया करवाते हैं। कमलाशंकर जैसे किसान इस देश में नई हरित क्रांति के जनक साबित हो रहे हैं।

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