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हार कर जीतने वाला बाजीगर

जीवन में हर शख़्स कभी ना कभी हारता है, ठोकर खाता है लेकिन आगे वही बढ़ता है जो उस ठोकर से, उस हार से सबक लेता है। ऐसे ही हैं सुलतानपुर के अभिषेक पाठक। अभिषेक नए ज़माने के उद्यमी हैं। नई सोच वाले युवा हैं। वो सिर्फ़ कारोबार नहीं कर रहे बल्कि सूत से नई क्रांति का सूत्रपात कर रहे हैं।

हमारे देश के कारीगर और अलग-अलग तरह की कारीगरी पूरी दुनिया में मशहूर है। हाथों की कारीगरी, ख़ासकर कपड़ों पर की गयी कारीगरी को लोग हाथों-हाथ लेते हैं। लेकिन, बावजूद इसके इससे जुड़े कलाकारों को उनके काम का सही मेहनताना और मान-सम्मान नहीं मिल पाता है। अभिषेक ने ऐसे ही कारीगरों के साथ मिलकर स्टार्टअप की शुरुआत की जो अब एक बड़े कारोबार का रूप ले चुका है।

यूपी के सुलतानपुर के रहने वाले 32 साल के अभिषेक पाठक NIIFT से पासआउट हैं और कई बड़ी कंपनियों में काम कर चुके हैं। अपनी पढ़ाई और नौकरी के दौरान अभिषेक को हमेशा से ही अपने देश के फैब्रिक ने आकर्षित किया। धीरे-धीरे अभिषेक की दिलचस्पी जुनून में बदल गयी और अभिषेक ने देशभर में घूम-घूमकर स्थानीय कारीगरों से मिलना और उनके काम को समझना शुरू किया। और, जैसा कि कहा जाता है, लोगों से मिलना और यात्राएं करना इंसान को बेहतर बनाती हैं, उसे हर दिन कुछ नया सिखाती हैं। वहीं हुआ और अभिषेक ने शुरुआत की स्टार्टअप की।

क़ामयाबी के लिए किया संघर्ष

अभिषेक को पहली बार में ही सफलता नहीं मिली। उन्होंने भी कई नये प्रयोग किए, कई नये काम किये, असफल भी हुए लेकिन हार नहीं मानी। अभिषेक ने अपने दोस्त के साथ मिलकर उन्होंने प्रकृति नाम से एक स्टार्टअप शुरू किया। इसमें वे प्रिंटेड बॉटम वियर ड्रेसेज तैयार करके उसकी मार्केटिंग करते थे। कुछ दिनों तक तो सब कुछ ठीक चला, लेकिन बिजनेस स्किल्स नहीं होने की वजह से इसे बंद करना पड़ा। इसके बाद वे एक संस्थान से जुड़ गए। जहां स्क्रेप फैब्रिक की मदद से ज्वेलरी बनती थी। यहां उन्हें कई टेक्सटाइल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट को लीड करने का मौका मिला। इस दौरान उत्तरप्रदेश, बिहार सहित कई राज्यों के स्थानीय कारीगरों के बीच जाने और उनके काम को क़रीब से देखने का मौक़ा मिला।

सोलर चरखे से मिली नई रोशनी

अभिषेक के जीवन में साल 2016 टर्निंग पांइट साबित हुआ। इसी साल अभिषेक ने पहली बार दिल्ली के प्रगति मैदान में सोलर चरखे को देखा और समझा। अभिषेक की नज़र में ये आविष्कार क्रांतिकारी है। वो कहते हैं कि इससे चरखे पर काम करने वाली महिलाओं की मेहनत आधी और उत्पादन दोगुना हो जाता है। इसके बाद उन्होंने इस मॉडल पर काम करना शुरू कर दिया। वे देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर स्थानीय कारीगरों से मिले और उन्हें सोलर चरखे के बारे में जानकारी दी। साल 2016 के अंत में अभिषेक एक गवर्नमेंट स्पॉन्सर्ड ऑर्गनाइजेशन भारतीय हरित खादी ग्रामोदय संस्थान के साथ जुड़ गए। इसके जृरिये उन्होंने उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और गुजरात की 3 हजार से अधिक महिलाओं को ट्रेनिंग दी और उन्हें सोलर चरखा मुहैया कराया। इसके बाद साल 2018 में केंद्र सरकार ने मिशन सोलर चरखा लॉन्च किया। इससे इस सेक्टर को और अधिक मजबूती मिली।

अभिषेक कहते हैं कि सोलर चरखे की मदद से महिलाओं का काम आसान हो गया। पहले जहां वो 8 घण्टे काम करने के बाद 100 रुपए भी नहीं कमा पाती थीं, वो 250 से 300 रुपए तक कमाने लगीं। इसके साथ ही धागों का प्रोडक्शन भी पहले के मुकाबले ज़्यादा होने लगा।

उत्पादन के बढ़ने से ज़रुरत महसूस हुई इसे खपाने के लिए बाज़ार में उतरने की और यहीं से पड़ी नींव अभिषेक के वर्तमान और सफल स्टार्ट अप ग्रीन वियर की। साल 2019 में शुरु हुआ ये स्टार्ट अप लखनऊ से काम करता है। भारतीय हरित खादी ग्रामोदय संस्थान की तरफ से जितने धागों का निर्माण होता है, अभिषेक उसे खरीद लेते हैं। फिर उत्तर प्रदेश और बिहार के स्थानीय बुनकरों को इसे देकर इससे फैब्रिक बनवाते हैं और फिर उससे शानदार कपड़े तैयार करते हैं। सूत से धागा, धागे से कपड़ा और कपड़े से गारमेन्ट तक की यात्रा पूरी होती है सोलर बेस्ड चरखे पर।

महिला कारीगरों का संवारा जीवन

अभिषेक पाठक का मुख्य फोकस सोलर बेस्ड चरखा और महिला कारीगर हैं। वो ख़ास तौर पर महिलाओं को स्वावलंबी बनने में मदद करते हैं। इस वक्त वो 500 महिलाओं के साथ काम कर रहे हैं और अभिषेक के स्टार्टअप का सालाना टर्न ओवर 2 करोड़ रुपए है। अभिषेक अपने बनाये गारमेन्ट बड़ी कंपनियों को सीधे बेचते हैं। इसके अलावा उनके लखनऊ में दो रिटेल स्टोर भी हैं और वो जल्द ऑनलाइन भी स्टोर शुरू करनेवाले हैं।

इंडिया स्टोरी प्रोजेक्ट की ओर से अभिषेक को शुभकामनाएं।