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खेत-खलिहान

MBA- पेड़ वाला-पानी वाला

MBAकी पढ़ाई के बाद लाखों का पैकेज। बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की पढ़ाई करने वाले हर युवा का कुछ ऐसा ही सपना होता है। वो रात-दिन पढ़ाई कर अपना कोर्स तो पूरा करता ही है साथ में अच्छी नौकरी भी हासिल करता है लेकिन इन्हीं में से कई युवा ऐसे होते हैं जो अपने लिए नई राह बनाते हैं, ऐसी राह जो जॉब के पैकेज पर नहीं उनके अंदर की आवाज़ पर बनती जाती है। इंडिया स्टोरी प्रोजेक्ट की आज की कहानी के नायक भी ऐसे ही हैं।

जज़्बा कुछ कर गुज़रने का

मित नाम है उनका, अमित कुमार। उम्र केवल 34 साल। हापुड़ के पिलखुआ के रहने वाले हैं। अमित कुछ साल पहले MBA की पढ़ाई के बाद मिली अपनी अच्छ-ख़ासी नौकरी छोड़ कर अपने घर लौट आए। उनका मन नौकरी में नहीं रमा, लाखों के पैकेज का बंधन भी उन्हें जकड़ नहीं पाया, शहर की चकाचौंध दुनिया उनपर अपना मोहपाश नहीं चला पाई। अमित लौट आए और फ़िर एक ऐसे काम की शुरुआत की जिसकी आज ना केवल हमारे समाज को बल्कि देश और पूरी दुनिया को सख़्त ज़रूरत है।

जल-जंगल से जुड़ाव

अमित का प्रकृति प्रेम जबरदस्त है। पेड़ और पानी के संरक्षण के लिए वो पिछले 7 सालों से लगातार काम कर रहे हैं।
अमित बताते हैं कि कहीं भी पानी की बर्बादी देखकर वो परेशान हो जाते थे। कहीं टूटे नल से बहता पानी देख कर वो उसे ठीक करने की पूरी कोशिश करते थे। कई टूटे नलों को वो ख़ुद बंद करवा देते थे ताकि पानी बर्बाद होने से बच सके। वो लोगों को जागरूक करने की कोशिश करते थे कि लोग पानी की बर्बाद होने से बचाएं। अमित का संदेश साफ़ था कि जल है तभी कल है। अगर जल ही नहीं रहेगा तो जीवन भी नहीं रहेगा। धीरे-धीरे अमित की ये मेहनत रंग लाने लगी। लोगों पर भी अमित की बातों का गहरा असर हुआ। इससे अमित का भी हौसला बुलंद हुआ। उन्हें लगा कि उनकी ज़िंदगी को एक नई राह मिल गई।

जल के साथ जंगल संरक्षण का अभियान

अमित ने ठान लिया कि अब प्रकृति के संरक्षण पर काम करना ही उनकी ज़िंदगी का मक़सद होगा। पानी बचाने के अभियान के साथ-साथ वो जंगल बचाने की मुहिम से भी जुड़ गए। उन्होंने अपनी मैनेजमेंट की पढ़ाई का इस्तेमाल इस मुहिम में करना शुरू कर दिया। अलग-अलग प्रोजेक्ट बनाकर पेड़-पौधे लगाने और जंगल बचाने का काम तेज़ कर दिया। उन्होंने इसमें अपने परिवार को भी जोड़ लिया। अपनी बेटी और भतीजी के जन्मदिन पर उनके नाम का पेड़ लगाकर लोगों को भी पेड़ लगाने के लिए जागरूक किया। उनका कहना है कि बच्चों के नाम पर पेड़ लगाकर उनका भी प्रकृति से एक जुड़ाव हो जाता है। इसी तरह उन्होंने नए साल या किसी ख़ास मौक़ों पर उपहार के रूप में पौधे देने की परंपरा का भी आग़ाज़ किया। लोगों को पेड़ लगाने के लिए ना केवल जागरूक किया बल्कि पौधारोपण के लिए उनकी ड्यूटी भी लगाई। इसका भी बहुत सकारात्मक असर हुआ। हापुड़ में लोगों ने इसमें ख़ूब दिलचस्पी दिखाई। अपने बच्चों के जन्मदिन पर पौधे लगाए और अपनी जान-पहचान वालों को गिफ़्ट में पौधे दिये।

पौधों की देखरेख भी है बहुत ज़रूरी

अमित हमेशा इस बात पर ज़ोर देते हैं कि सिर्फ़ पौधे लगाने भर से प्रकृति के प्रति ज़िम्मेदारी पूरी नहीं होती। उन पौधों की देखभाल भी उतनी ही ज़रूरी है। इसी सोच को साकार देने के लिए अमित अपने लगाए पौधों पर लगातार नज़र रखते हैं। अगर कोई पौधा सूख जाता है तो उसके बदले वो दूसरा पौधा लगा देते हैं। अमित की मोटरसाइकिल में हमेशा 4-5 बोतल पानी ज़रूर रहता है जिसे वो रास्ते में पड़ने वाले पौधों में डालते जाते हैं।

अमित की इस मुहिम में कई युवा अब उनके साथ जुड़ चुके हैं। इन्हीं पर्यावरण प्रेमियों के साथ मिलकर पिछले 7 सालों में अमित ने क़रीब 500 से ज़्यादा पौधे लगाए हैं जिनमें से क़रीब 300 तो अब पेड़ का आकार ले चुके हैं।

जंगल काटे जाने का विरोध

पर्यावरण के लिए नए पौधौं का रोपण उतना ही ज़रूरी है जितना पुराने पेड़ों का संरक्षण। अमित इस बात को भली-भांति जानते हैं तभी वो पेड़ काटे जाने के सख़्त ख़िलाफ़ हैं। बक्सवाहा के जंगल काटे जाने के विरोध में उन्होंने कई आंदोलन चलाए। वो और उनके साथियों ने पेड़ों से चिपक कर कटाई का विरोध किया। पेड़ों पर रक्षा सूत्र बांध कर पेड़ों की रक्षा का संकल्प किया। सरकार और प्रशासन से जंगल बचाने की पुरज़ोर अपील की।

साथ और सम्मान दोनों मिला

अमित एक स्कूल में टीचर हैं। इसके साथ-साथ वो पर्यावरण संरक्षण के महाअभियान में जुटे हुए हैं। लेकिन ये अभियान बहुत ख़र्चीला भी है। पौधों की ख़रीद, रोपाई, लगातार सिंचाई, घेराबंदी जैसी कई बातों में अच्छा-ख़ासा ख़र्च होता है। पहले अमित इसे ख़ुद अपनी सैलरी से पूरा करते थे लेकिन अब काफ़ी लोग उनके साथ हैं। परिवार और समाज के कई लोग उनकी मदद के लिए आगे आ चुके हैं। 100-200 के रूप में मिलने वाली मदद भी उनके बहुत काम आती है। अमित के इस पर्यावरण प्रेम ने उन्हें सम्मान भी दिलाया है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने उन्हें वाटर हीरो का तमगा दिया है। लेकिन अमित कुमार कुछ दूसरी ही मिट्टी के बने हैं। उन्हें ना तो पैसे की लालसा है ना सम्मान की। और ऐसे ही लोग समाज और देश में बदलाव लाते हैं।

पर्यावरण के लिए लगातार काम कर रहे अमित और उनकी टीम को इंडिया स्टोरी प्रोजेक्ट की ढेर सारी शुभकामनाएं।