Home » निधि की नई शुरुआत
Insight

निधि की नई शुरुआत

कहते हैं जब मुश्किल सामने आती है तभी इंसान उससे लड़ने और जीतने का रास्ता खोजता है। पिछले दो सालों से देश ही नहीं दुनिया में छाई कोरोना की महामारी और उससे बने हालातों ने भी लोगों को संघर्ष करना सिखा दिया। इस दौर ने कई लोगों की ज़िंदगी बदल दी। ऐसा ही कुछ हुआ निधि के साथ। पटना में रहने वाली निधि सिन्हा ने इसी दौर में अपने मुश्किल हालातों से आगे बढ़ कर एक नई शुरुआत की।

कोरोनाकाल में बदली ज़िंदगी

यूं तो निधि शुरुआत से ही प्रोफेशनल रही हैं। साल 2000 में वो छपरा में सिलाई, कढ़ाई और पेंटिंग सिखाने का सेंटर चलाती थीं। 2004 में जब पटना आईं तो यहां भी बैठी नहीं। एन.एन कॉलेज से मार्केटिंग में मैनेजमेंट किया और फ़िर 2009 से एक स्कूल में पढ़ाने लग गईं। पढ़ाने के साथ-साथ उन्होंने ख़ुद की शिक्षा भी जारी रखी। 2019 में डिप्लोमा इन एलिमेंट्री एजुकेशन और C-TET की परीक्षा भी पास कर ली। पति की वकालत और स्कूल की तनख्वाह से ज़िंदगी अच्छे से बसर हो रही थी लेकिन फ़िर वो दौर आया जिसने हर किसी की ज़िंदगी में उथल-पुथल मचा दी। वो दौर था कोरोना का। वो दौर था लॉकडाउन का। उस समय कोर्ट बंद हो गए। स्कूल बंद हो गए। पति की कमाई रुक गई और स्कूल ने निधि की तनख़्वाह आधी कर दी। निधि के लिए अब मुश्किलों का दौर शुरू हो चुका था। बड़ा बेटा इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था, छोटे की भी पढ़ाई चल रही थी। घर के ख़र्चे रुके नहीं थे लेकिन आमदनी रुक सी गई थी। इसी मुश्किल हालात से निपटने के लिए निधि रास्ता तलाशने लगीं। उनके दिल-ओ-दिमाग में हमेशा यही बात घूमती रहती कि आख़िर वो कौन सा ऐसा काम करें जिससे ज़िंदगी की गाड़ी फ़िर से पटरी पर आ जाए।

कोरोना काल में अच्छे, सेहतमंद और साफ़-सुथरे खाने पर ज़ोर दिया जा रहा था। बस यही बात निधि को रास्ता दिखा गई। निधि ने घर में तैयार खाने की सामग्रियां बेचने का फ़ैसला कर लिया। इसकी प्रेरणा उनको अपनी दो बहनों से भी मिलीं जो केक और फूड आइटम्स के काम से जुड़ी थीं।

देसी प्रोडक्ट ने दिखाया दम

निधि ने 14 जनवरी 2021 को आंवले का मुरब्बा, सत्तू, बेसन और मल्टीग्रेन आटे के साथ कारोबार की शुरुआत की। डर इस बात का भी था कि सामान तैयार कर लें और बिके नहीं तो भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। लेकिन निधि ने इस डर पर जीत पाकर अपना काम जारी रखा। बेहद साफ़-सुथरे ढंग से इन चीजों को तैयार किया और अपनी जान-पहचान वालों तक इसे पहुंचाया। निधि की मेहनत रंग लाई। लोगों को उनके प्रोडक्ट्स भा गए। अब उन्हें ऑर्डर मिलने लगे। बहनों ने भी निधि का साथ दिया। वो निधि से सामान मंगवा कर अपने-अपने शहरों में बेचने लगीं। इससे निधि का कारोबार जमने लगा। निधि ने अब अपने उत्पादों में अचार को भी शामिल कर लिया। आम, नींबू, मिर्च के अचार के साथ-साथ निधि के हर प्रोडक्ट बिल्कुल देसी अंदाज़ में या यूं कहें कि नानी-दादी के पारंपरिक तरीकों से तैयार होते थे। पुराने ज़ायकों का स्वाद जब आज के लोगों की ज़ुबान पर चढ़ा तो जैसे रंगत बिखर आई।

कारोबार बढ़ा तो रोज़गार दिया


बहुत कम समय में निधि के प्रोडक्ट्स ने लोगों के बीच अपनी जगह बना ली। अब उन्होंने ऑनलाइन ऑर्डर भी लेने शुरू कर दिये। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर भी उनके सत्तू, अचार, मुरब्बों की बिक्री बढ़ने लगी। काम बढ़ा तो निधि ने अपने साथ 4 महिलाओं को जोड़ लिया। अब काम में तेज़ी आने लगी। पैकेजिंग के लिए निधि ने मशीन ले ली। साफ़-सुथरे, स्वादिष्ट और सेहतमंद प्रोडक्ट लोगों की पसंद बन गए। फिलहाल करीब 10 लोग निधि के इस कारोबार से जुड़ चुके हैं।

मुश्किलों को पार कर आगे बढ़ने का जज़्बा

इस काम की शुरुआत में निधि को कई तरह की दिक्कतें आईं। पहली समस्या पूंजी की थी। हालात ठीक नहीं थे, ऐसे में बिजनेस के लिए पूंजी लगाना बड़ा रिस्क था। लेकिन निधि ने ये रिस्क लिया और 50 हज़ार की लागत से काम की शुरुआत की। दूसरी समस्या थी लोगों का बर्ताव। शुरुआत में निधि ने अपनी योजना के बारे में कई लोगों से बात की लेकिन ज़्यादातर का रिस्पॉन्स अच्छा नहीं रहा। कइयों ने तो मज़ाक भी उड़ाया। लेकिन अपने पति, बच्चों और बहनों के साथ के दम पर निधि ने इन मुश्किलों को पार कर लिया। शुरुआत में सुस्त रफ़्तार से बिकने वाले प्रोडक्ट अब पटना ही नहीं, दिल्ली, मुंबई, पुणे, हैदराबाद, बैंगलोर, मध्य प्रदेश और गुजरात तक पहुंच चुके हैं। निधि की ये कामयाबी बता रही है कि बाधाएं हमारा रास्ता तो रोक सकती हैं लेकिन हमारा हौसला और कुछ कर दिखाने का जज़्बा उन बाधाओं को दूर कर बदलाव ला सकता है।