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एक इंसान के किवदंती बनने की कहानी

यकीन कर पाना मुश्किल है कि एक शख्स ने अपने दम पर जंगल उगा लिया। जंगल मतलब जंगल। एक दो सौ की बात छोड़िए छह सौ एकड़ में फैला जंगल। हैरान रह गए ? बात भी वैसी ही है। आख़िर ऐसा कैसे संभव है ? लेकिन इस असंभव से काम को कर दिखाया है बस्तर के दामोदर कश्यप ने।

बस्तर के संघकरमरी गांव के आसपास आज 600 एकड़ में फैला विशाल जंगल है। ऐसा जंगल जो हज़ारों-लाखों पेड़-पौधौं, झाड़ियों और लताओं से भरा हुआ है। ये जंगल इतना घना है कि आदमी गुम हो जाए तो मिलना मुश्किल हो जाए। ये इतना घना और विशाल जंगल है जो सिर्फ़ छत्तीसगढ़ ही नहीं पूरे देश के लिए प्राणवायु का काम कर रहा है। इससे निकलने वाले वनोपज यहां के लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रहे हैं।

लेकिन क़रीब 50 साल पहले ऐसा नहीं था। केवल 20 सालों में यहां के जंगल बिल्कुल ख़त्म हो गए थे और तब दामोदर ने इस जंगल को फ़िर से हरा-भरा करने की ठानी और उसे कर के भी दिखाया।

दामोदर कश्यप का जन्म इसी संघकरमरी गांव में हुआ था। ये गांव तब हर तरफ़ से जंगल से घिरा हुआ था। तरह-तरह के पेड़-पौधे। फलों से लदे हुए, जड़ी-बूटी से भरे हुए। इन्हीं पेड़-पौधौं के बीच रह कर, खेल कर दामोदर बड़े हुए। शुरुआती शिक्षा के बाद वो आगे की पढ़ाई के लिए जगदलपुर चले गए। कुछ सालों बाद जब वो लौटे तो वहां की तस्वीर उनके लिए किसी सदमे से कम नहीं थी। गांव के चारों तरफ़ फैले जंगल सिमट ही नहीं ख़त्म हो चुके थे। ये बात 1970 की थी। वन विभाग की लापरवाही ने पूरे जंगल को जैसे निगल लिया था। कश्यप के लिए अब उनका गांव वो गांव नहीं रहा था। पेड़ों का कटना, जंगल का ख़त्म होना, उनके लिए उनकी ज़िंदगी का ख़त्म होना जैसा लगने लगा।

ख़त्म हो चुके जंगल को फ़िर से उगाया

दामोदर कश्यप ने ठान लिया कि वो अपने जंगलों को यूं ख़त्म होते नहीं देख सकते। वो सिर्फ़ अफ़सोस करने और हालात से समझौता करने वालों में से नहीं थे। उन्होंने जंगल को फ़िर से उगाने का प्रण लिया। दामोदर पेड़ लगाने और पेड़ बचाने के अभियान में जुट गए। वो ख़ुद तो पेड़ लगा ही रहे थे, गांववालों को भी इसके प्रति जागरूक करना शुरू किया। इसका असर भी हुआ। जिन लोगों ने ख़ुद कुछ साल पहले अपने आसपास के जंगलों को काट डाला था, अब वो भी पेड़ लगाने और उन्हें संरक्षित करने के मिशन में शामिल हो गए थे। गांव में दामोदर कश्यप एक पढ़े-लिखे और काम करने वाले युवा के तौर पर जाने जाने लगे। इसी बीच सरपंच का चुनाव हुआ और दामोदर को इसमें जीत हासिल हुई। जब दामोदर सरपंच बने तो जंगल लगाने के काम में तेज़ी आई। उन्होंने गांववालों के साथ वन विभाग को भी इसमें जोड़ा। अभियान के नतीजे अच्छे आने लगे। जंगल अब आकार ले रहा था। इस समय दामोदर को ज़रूरत महसूस हुई लगते और बढ़ते जंगल को बचाने के लिए सख़्त क़दम उठाए जाने की। उन्हें लगा कि कहीं ऐसा ना हो कि इन जंगलों को फ़िर से लोग काट कर नष्ट कर दें। दामोदर ने जंगल के लिए कुछ नियम बनाए। जंगल में पशुओं को चराने पर रोक लगा दी गई। जंगल से सूखी लकड़ी तो ली जा सकती थी लेकिन हरे-कच्चे पेड़ों को काटना मना हो गया। पेड़ काटने पर पांच सौ रुपये का ज़ुर्माना तय किया गया।

ठेंगापाली से जंगल को बचाने का अभियान

दामोदर ने जंगल को अपने गांव की देवी से जोड़ दिया। उन्हीं के नाम पर जंगल का नाम रख दिया। इससे जंगल से लोगों का आस्था और भक्ति का भी नाता जुड़ गया। जंगल की निगरानी के लिए उन्होंने ग्रामीण परंपरा का सहारा लिया। ग्राम देवी की पूजा में इस्तेमाल होने वाले झंडों को बांस में बांधा और उसे लेकर जंगल के चक्कर लगाने का नियम बना दिया। झंडे लगे हुए डंडे को ठेंगा कहा जाता है और पाली यानी बारी। यानी ठेंगा लेकर जंगल की निगरानी करने की बारी। नियम ऐसा बना कि गांव के कुछ लोग इस ठेंगापाली को उठाकर जंगल जाएंगे। दिन भर वो पूरे जंगल में घूम-घूम कर उसकी रक्षा करेंगे। शाम में जब वो घर लौटेंगे तो उस ठेंगापाली को पड़ोसी के घर रख आएंगे। अगले दिन वही शख्स ठेंगापाली लेकर जंगल की रखवाली करने जाएगा। अपनी बारी आने पर निगरानी के लिए नहीं जाने वाले के लिए भी 500 रुपये के ज़ुर्माने का प्रावधान रखा गया। इस तरह दामोदर ने पूरे गांव को जंगल संरक्षण से जोड़ दिया।

दामोदर बताते हैं कि ग्राम देवी के नाम से जंगल को जोड़ने से बहुत फ़ायदे हुए। एक तो जंगल की रक्षा हुई और दूसरे जंगल के वनोपज से हुई आय से देवी का मंदिर बन गया।

600 एकड़ में फैला विशाल जंगल

दामोदर का जंगल अब 600 एकड़ में फैल चुका है। दामोदर ने अपनी ज़मीन भी जंगल के नाम कर दी है। उसमें भी उन्होंने जंगल की ही तरह आम, महुआ, चिरौंजी जैसे फलदार पेड़ लगाए हैं। वो इस जंगल के चप्पे-चप्पे से वाकिफ़ हैं। यहां आप खो सकते हैं लेकिन दामोदर नहीं। वो कहते हैं कि ‘मैं यहां के एक-एक पेड़ को जानता हूं। यहां मैं कैसे खो सकता हूं।‘ अब तो आसपास के कई गांव भी इस मिशन जंगल से जुड़ चुके हैं। ये अभियान दिन-ब-दिन और विस्तार लेता जा रहा है।

देश-विदेश में मिला सम्मान

दामोदर को जंगल संरक्षण के लिए कई सम्मान भी मिले हैं। साल 2014 में स्विट्जरलैंड के पीकेएफ ( पाल के. फेयरवेंड फाउण्डेशन) नामक संस्था ने और साल 2015 में ही सीसीएस संस्था ( कंजरवेशन कोर सोसायटी) ने उन्हें सम्मानित किया। लेकिन 72 साल के दामोदर कश्यप को इन सम्मानों से ना तो उतना प्रेम है ना ही चाहत। वो तो अपना जंगल चाहते थे, जिसे उन्होंने ख़ुद से बनाया, बसाया, उगाया और रक्षा की।