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कहानी कर्मवीर की

हममें से ज़्यादातर लोगों की ज़िंदगी अपनी जद्दोजहद में बीत जाती है। हम अपने कामों में इतने मशरूफ़ रहते हैं कि हमारे आस-पास रहने वाले बेबस और मजबूर लोगों की तरफ़ नज़र तक नहीं जाती, और कभी जाती भी है तो हम उन्हें नज़रअंदाज़ कर देते हैं। लेकिन हमारे बीच ही कई ऐसे लोग भी हैं जो इन बेबस-बेसहारा और पीड़ित लोगों की मदद के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी झोंक देते हैं। आज इंडिया स्टोरी प्रोजेक्ट में कहानी ऐसे ही कर्मवीर की।

वो पारस हैं। सिर्फ़ नाम से ही नहीं अपने काम से भी। 36 साल के नरेश पारस आगरा के बाशिंदे हैं। पब्लिकेशन हाउस में काम करने वाले नरेश ज़मीन से जुड़ कर काम करना पसंद करते हैं। वो पिछले 15 सालों से शोषित-पीड़ित और समाज के निचले पायदान पर रहने वाले लोगों के लिए काम कर रहे हैं। बचपन में निरक्षर रिक्शे वालों के लिए चिट्ठी लिखने और पढ़ने से नरेश का वास्ता ऐसे लोगों से पड़ने लगा। आगे चल कर लोग उनसे अपनी-अपनी समस्याओं के लिए सरकारी विभागों में देने के लिए आवेदन लिखवाने लगे। नरेश पढ़ाई के साथ-साथ इस काम को दिलचस्पी से कर रहे थे। इसी से उन्हें आम लोगों की समस्याओं के बारे में पता चलना शुरू हुआ।

गुमशुदा की तलाश का अभियान

नरेश की ज़िंदगी में एक बड़ा मोड़ आया साल 2007 में जब उनकी मुलाक़ात एक ऐसी महिला से हुई जिनके तीन बच्चे एक साल के दरमियान ग़ायब हो गए थे। महिला थाने के चक्कर लगाते-लगाते थक चुकी थी लेकिन उसके बच्चों को खोजना तो दूर, उसकी रिपोर्ट तक नहीं लिखी गई। नरेश ने इसे मुहिम बना लिया। थाने में सुनवाई नहीं हुई तो बड़े अधिकारियों और राज्य मानवाधिकार आयोग तक का दरवाज़ा खटखटाया। आयोग से आगरा SSP को नोटिस मिलने के बाद पुलिस की नींद टूटी और फिर बच्चों की तलाश शुरू हुई। लेकिन तब तक 5 साल बीत चुके थे। लाख कोशिशों के बाद भी बच्चों का पता नहीं चल पाया। उस दिन के बाद नरेश ने गुम हुए बच्चों और लोगों को उनके परिवार से मिलाना अपने जीवन का मक़सद बना लिया। अब तक नरेश 200 से ज़्यादा लोगों को उनके परिवार तक पहुंचा चुके हैं।


हरिद्वार कुंभ में दिखा असर

नरेश ने हरिद्वार कुंभ को बच्चों के लिए सुरक्षित बनाने उत्तराखंड सरकार को एक प्रस्ताव भी दिया था। नरेश का प्रस्ताव इतना पसंद आया कि प्रशासन ने उसपर अमल भी किया। मेले में आने वाले हर बच्चे की जेब में नाम और पते की पर्ची डाली गई। मेले में 6 चाइल्ड फ्रेंडली कॉर्नर बनाए गए। पुलिस, पैरा मिलिट्री फोर्स और स्वंयसेवकों को बच्चों को लेकर विशेष ट्रेनिंग दी गई ताकि गुम हुए बच्चों को जल्द से जल्द उनके घरवालों तक पहुंचाया जा सके।

जेलों में बंद क़ैदियों की मदद

देश की जेलों में हज़ारों-हज़ार ऐसे क़ैदी बंद हैं जिन्हें ज़मानत तो मिल गई है लेकिन बेल के लिए उनके पैस पैसे नहीं हैं। नरेश वैसे क़ैदियों की मदद में जुटे हैं। जेलों में तय संख्या से अधिक क़ैदियों को रखे जाने के ख़िलाफ़ भी उन्होंने अभियान चलाया हुआ है। वो बताते हैं कि उनके अभियान की वजह से जेल मैनुअल बदलने पर काम चल रहा है।

इस काम के शुरुआत की प्रेरणा भी उन्हें एक केस से मिली। नरेश को पता चला था कि आगरा के नारी संरक्षण केंद्र में एक युवती 9 साल से क़ैद है वो भी बिना किसी अपराध के। उसे 14 साल की उम्र में पुलिस ने अकेले पाया था। बजाए उसके घरवालों की तलाश के उस युवती को नारी संरक्षण केंद्र में रख दिया गया। वो बच्ची देह व्यापार की आरोपी महिलाओं के बीच रहने लगी। नरेश ने इसके ख़िलाफ़ भी अभियान शुरू कर दिया। स्थानीय प्रशासन, पुलिस और मानवाधिकार आयोग को युवती के बारे में बताया। उनके इस अभियान का असर हुआ। वो उस अवैध क़ैद से बाहर आई और अब एक ख़ुशहाल ज़िंदगी जी रही है।

हाशिये पर रहने वालों को मुख्य धारा से जोड़ने की कोशिश

नरेश को झुग्गी बस्तियों में, कचरे बीन कर ज़िंदगी गुज़ारने वाले बच्चों को देखकर बड़ी कोफ़्त होती थी। वो इस हालात को बदलना चाहते थे। इसकी शुरुआत भी उन्होंने की। पहले तो बच्चों और उनके घरवालों से बात की। उन्हें पढ़ाई का महत्व समझाया और स्कूल जाने के लिए प्रेरित किया। बहुत मुश्किल आई लेकिन कई लोग तैयार भी हो गए। लेकिन नरेश के सामने एक और परेशानी खड़ी हो गई। जब बच्चों का दाखिला वो सरकारी स्कूल में कराने गए तो वहां पढ़ाने वाले कई शिक्षकों ने इसका विरोध कर दिया। उनका कहना था कि बच्चे बहुत गंदे हैं और उनसे बदबू आती है। यहां तक की एक प्रिंसिपल ने तो जाति को लेकर भी एडमिशन देने से मना कर दिया। नरेश को शिक्षकों का ये बर्ताव हैरान कर गया लेकिन वो पीछे हटने वाले तो थे नहीं। एक तरफ तो उन्होंने बच्चों को सफ़ाई का महत्व समझाया तो दूसरी तरफ उन्होंने शिक्षा विभाग के दफ़्तर की पार्किंग में ही बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। उन्होंने एलान कर दिया कि जब तक एडमिशन नहीं मिलता तब तक बच्चे पार्किंग में ही पढ़ेंगे। इसके बाद विभाग में हड़कंप मचा और फिर बच्चों का दाखिला कराया गया। आज उनमें से कई बच्चे अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रहे हैं।

इसके साथ ही नरेश सेक्स रैकेट में फंसी युवतियों, निचली बस्तियों में रहने वाले लोगों के वैक्सीनेशन जैसे कामों से भी जुड़े हैं।

हर मुश्किल पर पाई विजय

ये समाज और देश के लिए काम करने का जज़्बा ही है जो नरेश को हार नहीं मानने देता है। शुरुआत में घरवालों ने भी उनके सामाजिक कामों का विरोध किया था। अपने करियर पर ध्यान देने की नसीहत दी थी। लेकिन नरेश नहीं रुके। कई बार उन्हें धमकियां मिलीं, कई बार झूठे मुक़दमों में फंसाने की कोशिश की गई , शिकायतों की वजह से स्थानीय प्रशासन और पुलिस के अधिकारी नाराज़ भी रहते हैं, लेकिन नरेश बढ़ते गए। उनकी यही सोच, उनकी यही लगन समाज के हज़ारों-लाखों बेसहारा लोगों के लिए उम्मीद की एक नई किरण बन गई है।

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